आज हम अपनी जिन्दगी में छोटी-छोटी बातों पर ही परेशान हो जाते हैं मतलब हमें बहुत जल्दी हर बात पर चिड़चिड़ापन या गुस्सा आ जाता है और आजकल हमें नेगिटिव(नकारात्मक) बातें बहुत परेशान करने लगी हैं।
क्या आप जानतें हैं इसका कारण कि हमारे साथ ऐसा क्यूं हो रहा है...
अगर नहीं, तो आइए जानतें हैं।
इसका सबसे बड़ा कारण है कि आज हम चारों तरफ से नेगिटिव(नकारात्मक) वातावरण में जी रहे हैं...जिसके कारण हमारे अन्दर की शक्तियाँ खत्म हो चुकी हैं, शक्तियाँ खत्म होने के कारण ही हम छोटी सी कोई बात को भी सहन नहीं कर पाते और अपना साईलेन्स(शान्त) लेवल खो बैठते हैं, जिससे हमारे में चिड़चिड़ापन या गुस्सा पैदा होता है दिन में कई बार।
नेगिटिव वातावरण के कारण ही अनेक प्रकार के ऐसे विचार हैं, जिनमें से कुछ हमारे दिमाग में बार-बार चलते हैं और हमें दिन-प्रतिदिन अन्दर से खोखला(खाली) किए जा रहे हैं। आइए जानते हैं, वो कैसे-कैसे विचार हमारे अन्दर बार-बार चलते हैं:-
1). कहीं भी सफलता नहीं मिल रही।
2). बनती-बनती बात बिगड़ गई।
3). काम का दबाव(Pressure) बहुत है।
4). खर्चे ही पूरे नहीं होते।
5). फँस गए इस काम में तो।
6). मेरे पल्ले तो कुछ भी नहीं।
7). लोग मेरे से ज्यादा चालाक हैं।
08). ओरों के पास तो इतना-इतना पैसा है, जमींनें हैं...ओर मेरे पास.....
9). मेरे पास वो चीज नहीं है।
10). ठीक चलते-चलते अचानक पता नहीं क्या हो गया।
11). उसने मुझे धोखा दे दिया।
12). गल्त घर में मेरी शादी करवा दी।
13). Adjustment ही नहीं करते वो हमारे साथ।
14). प्रापर्टी(सम्पति) में से मेरा हिस्सा मुझे दिया जाए, मैं किसी भी हद तक जाउंगा...अपना हिस्सा लेने के लिए।
15). वो खुद की गल्ती स्वीकार ही नहीं करता(जबकि ताली दोनों हाथों से बजती है)।
16). कारोबार ही थप हो गया।
17). लोग बहुत पापी बन चुके हैं।
18). मेरे पर किसी ने कुछ(जादू-टोना बगैरा) करवा दिया, दिमाग चलना ही बन्द हो गया।
19). मेरा क्या होगा, मेरे बच्चों का क्या होगा।
20). डर लगता है कि कहीं कुछ ऐसा-वैसा ना हो जाए।
21). कोई रिश्तेदार हाल पूछने ही नहीं आता।
22). मेरे बच्चे मेरी सुनते ही नहीं।
23). कई बार बीती हुई बातें या भविष्य की चिंता की बातें बार-बार घूमने लगती हैं दिमाग में।
24). धक्के खा रहे हैं जिन्दगी के।
25). मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया उसने।
26). उसने मुझे बहुत दुखी किया है...जी करता है....उसे मार डालूं।
27). वो मुझे छोड़कर चला गया (या चली गई)।
28). कई बार अकेलापन फील होता है।
29). कोई मेरा अपना नहीं है।
30). दिन में सिर कई बार भारी-भारी सा लगता है जबकि बुखार भी नहीं हुआ होता।
31). कोई खुशी नहीं है।
32). कहीं भी मन नहीं लगता।
33). जी करता है....कहीं भाग जाउं...इस नरक को छोड़कर।
34). जी करता है...मर जाउं।
35). यह जिन्दगी बोरिंग है।
36). मेरी कोई ईज्जत ही नहीं।
37). टाइम ही नहीं पास हो रहा।
38). मेरी ये बीमारी ठीक ही नहीं हो रही, पता नहीं...कौन-से पाप किए हैं।
39). मेरा शरीर अब चलने लायक नहीं रहा।
40). बहुत दूँढा भगवान को, पर नहीं मिला।
41). मेरे तो कर्म ही बेकार(खोट्टे) हैं।
42). अब तो भगवान मुझे उठा ले...तो अच्छा है।
43). भगवान ने ये दुनिया बनाई ही क्यूँ।
44). मैं उसके बिना नहीं जी सकता(या नहीं जी सकती)।
45). मैं कोई कम हूँ क्या उससे, उसकी अक्ल तो मैं ठिकाने लगाकर ही छोड़ूंगा।
46). उसकी जमीन मेरे नाम हो जाए ना...तो मजा आ जाए।
47). वो है ही क्या चीज मेरे सामने।
48). खायो, पियो, मौज करो...किसने देखा है परमात्मा।
49). कमाल है यार...अगर तूने दारू, अण्डा, माँस ही नहीं खाया कभी, फिर तेरी क्या जिन्दगी है...उपर जाकर धर्मराज को क्या जबाव देगा।
50). मेरी बिल्ली मुझे म्याँउं।
51). इनका तो घर ही उजड़ जाए।
52). ये कभी नहीं सुधर सकते।
53). उसने मेरी बेइज्जती की...जब तक बदला नहीं ले लेता...तब तक मेरी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।
54). बस पूछो मत...हमें पता है बस...कि कैसे दिन काट रहे हैं...जिन्दगी के।
ये थे ऐसे विचार, जिनमें से 5-7 तो आजकल हरेक मानव के अन्दर चल रहे हैं हर रोज।
इन विचारों से या तो हम अपने लिए गल्त सोचते हैं या फिर दूसरों के लिए। गल्त विचार बार-बार दिमाग में आने से दिमाग की सही सोचने की तथा सही फैसला करने की शक्ति खत्म हो रही है दिन-प्रतिदिन। ओर जब इंसान की सही सोचने की शक्ति समाप्त होने लगती है तो वो चाहता है कि वही हो जो वो चाहता है ओर जब वैसा नहीं होता, तब पैदा होता है गुस्सा।
गुस्से के पैदा होने से शरीर में चलने वाला खून जहरीला बनता है, जिससे हमारे अन्दर की शक्तियाँ धीरे-धीरे खत्म होती जाती हैं। शक्तियों के खत्म होने के बाद हमारा स्वभाव चिड़चिड़ा बनता जाता है धीरे-धीरे। ओर जब स्वभाव चिड़चिड़ा बन जाता है, फिर चाहे हमें सब कुछ...घर-बार, बाल-बच्चे, गाड़ियाँ, पैसा आदि मिल जाए, लेकिन हमें ऐसा लगता है कि कुछ तो है-जिस चीज की हमें अभी भी कमी है ओर वो कमी होती है-जिन्दगी में सच्ची खुशी की, सच्चे सुकून की। चाहे हम इस कमी के बारे में किसी को बताते नहीं लेकिन अन्दर-ही-अन्दर फील करते हैं इस कमी को। इस सच्ची खुशी को पाने के लिए पता नहीं हम क्या-क्या तरीक्के अपनाते हैं जिन्दगी भर लेकिन सब कुछ करने के बाद भी यही फील होता है कि दिल खुश नहीं है।मतलब उदासी फिर भी कभी-ना-कभी फील जरूर होती है।
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