Saturday, November 21, 2015

Day 2

आज संसार के 80% लोगों को ये कमी फील हो रही है, क्या आपके साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, अगर हाँ, तो आइए जानते हैं कि कैसे इस कमी को पूरा किया जाए।

अब मुख्य बात है कि इस कमी को भरा कैसे जाए, तो देखिए, सीधी सी बात है-जब हमारे अन्दर की शक्तियाँ वापिस आने लगेगीं, फिर हमारी खुशी भी जागृत होने लगेगी।

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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अन्दर की शक्तियाँ हमें देगा कौन? सवाल का जबाव बिल्कुल आसान है। अन्दर की शक्तियाँ वापिस हमें वही दे सकता है जो इन शक्तियों का भण्डार हो, Power-house हो, ओर इन शक्तियों का भण्डार है-खुद परमात्मा। मतलब कि इन शक्तियों को फिर से जगाने के लिए हमें परमात्मा(Power-house) से सम्बन्ध जोड़ना होंगा, ओर परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने से पहले हमें सबसे पहले दो बातों की पहचान होना बहुत जरूरी है:-

कौन-कौन सी:-

1). खुदा(परमात्मा) की असली पहचान।

2). खुद की असली पहचान।

जानते हैं सबसे पहले खुदा(परमात्मा) की असली पहचान:-

देखिए परमात्मा एक है, हम सभी जानते हैं लेकिन जानते हुए भी कोई माँ शेराँवाली को, कोई श्रीराम को, कोई हनुमान को, कोई वाहेगुरू को तो कोई यीशु को भगवान मानता है। अब असली बात देखिए, परमात्मा उसे ही कहा जाएगा जिसे संसार के मुख्य सभी धर्म बराबर मान्यता देते हों। संसार के मुख्य धर्म हैं:-हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई। देखते हैं-ये चारों धर्म भगवान को कैसे मान्यता देते हैं:-

आइए जानते हैं सबसे पहले कि हिन्दु धर्म क्या कहता है:-

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पिक्चर में आप देख रहे हैं कि खुद श्रीराम जी शिवलिंग की पूजा कर रहे हैं, इसका मतलब हुआ कि शिव, श्रीराम से भी बड़े हैं। अगर श्रीराम खुद भगवान होते, तो उन्हे खुद की ही पूजा की क्या जरूरत थी, और एक ओर बात, जो हम सभी जानते हैं कि श्रीराम एवंम श्रीकृष्ण की एक ही आत्मा थी मतलब दोनों एक ही व्यक्ति के दो रूप थे।

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तो इससे पता चलता है कि शिव इन दोनों से भी उंच हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण तो देवता हैं लेकिन शिव परमात्मा हैं।

यहाँ पर एक ओर बात क्लीयर करने योग्य है कि शिव और शंकर में भी फर्क है।

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खुद शंकर जी भी शिव की पूजा करते हैं। शंकर जी तो देवता हैं लेकिन शिव वो हैं जो शिवलिंग में तीन लाइनों के बीच बिन्दु दिखाई गई है। मतलब शिव निराकार ज्योति बिन्दु हैं, लाइट (प्रकाश) हैं। तो ये सब बातें थी हिन्दु धर्म की। मतलब हिन्दु धर्म शिव को सबसे उंच मानता है।

मुस्लिम धर्म की बात सुनिए, इनका जो Head-office है मक्का में, उसके अन्दर शिवलिंग का ही पत्थर रखा हुआ है, जिसे वो अल्लाह कह कर याद करते हैं।

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सिक्ख धर्म के संस्थापक श्री गुरू नानक देव जी ने कहा था...परमात्मा इक है अते ओह इक नूर है, ज्योति है, मतलब निराकार है।

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ईसाई धर्म के मसीहा यीशु जी ने भी कहा-'God is light.'

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तो ये हैं संसार के मुख्य चार धर्म, जिन्होने कहा कि परमात्मा निराकार है, ज्योति है, प्रकाश है, मतलब कि हमें शक्तियाँ लेने के लिए सम्बन्ध भी निराकार से ही जोड़ना होंगा।

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ये तो थी परमात्मा (खुदा) की असली पहचान। अब देखते हैं कि हम कौन हैं वास्तव में अर्थात हमारी असली पहचान क्या है?

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Day 4

अब मुख्य बात है कि भगवान(Power-house) से सम्बन्ध जोड़ा कैसा जाए, आइए जानते हैं:-

(01). स्वंयम सर्वशक्तिमान परमात्मा पिता मेरे साथ है, मैं आत्मा उनकी संतान हूँ, मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ। इस बात को 21 बार सुबह और 21 बार शाम को डायरी में लिखें।

(02). और नीचे लिखे गीतों को कम-से-कम दिन में दो बार जरूर सुनें(विशेष कानों में Head-phones लगाकर):-

01). इक बार चले आओ...भक्तों ने पुकारा है...

02). गुरू ब्रह्मा, गुरू विष्णु, गुरू महेश्वरा...

03). सारे तीर्थ धाम आपके चरणों में...

04). आपकी संतान है हम...आपसे क्या प्रार्थना...

05). आबू के तीर्थ तुमको पुकारें...आ जाओ ब्रह्मा बाबा हमारे...आना ही होंगा...

06). बाबा तुम हो हमारे, हम हैं तुम्हारे...

07). वरदान लुटाने वाले, सद्ज्ञान सुनाने वाले...

08). ऐ साँसों...शिव की याद बिना चलते रहना किस काम का है...

9). मेरे मन तू मग्न रह...प्रभु याद में...

10). अब तेरे बिन...इक पल भी ना बीते बाबा...

11). चलो मुसाफिर अपने घर...अब तो पूरा हुआ सफर...।

03). अगर आप शक्तियाँ बहुत जल्दी ग्रहण करना चाहते हैं तो सुबह 4 बजे और शाम 7 बजे बैठकर 15-15 मिनट योग लगाइए, उस समय वातावरण बिल्कुल शांत होता है, इसलिए परमात्मा की शक्तियाँ उस समय बहुत जल्दी प्राप्त हो सकती हैं। यहाँ पर एक बात ध्यान रखें कि योग लगाने के समय आप वहाँ ना बैठें जहाँ आप सोते हो।

4). परमात्मा से योग लगाना कैसे है, उसके लिए आप नेट से इस वीडियो की मदद ले सकते हैं।

5). परमात्मा से योग लगाने के लिए 100 में से 98 लोगों का बहाना होता है कि टाइम ही नहीं मिलता। लेकिन यह हमारी गल्तफहमी है। दिन में हम तीन बार भोजन करते हैं ओर एक बार भोजन करने में हमें 15 मिनट तो लगते ही हैं...यानि कि हम सभी 15*3=45 मिनट तो भगवान को याद कर ही सकते हैं।

परमात्मा से लिंक जोड़ते समय नीचे लिखी बातों का बहुत ख्याल रखें:-

01). टी.वी. या नेट पर चलने वाले नाटक और पिक्चरस से बचें, अगर आपको देखना ही है तो हँसी-मजाक वाले या कार्टून या फिर आध्यात्मिक चैनल्स ही देखें। सांइस ने Experiment किया है कि आजकल के नाटक और पिक्चरस इंसान को सबसे ज्यादा कमजोर बना रहे हैं।

02). अपनी दोस्ती केवल उनसे ही रखें जो हमेशा अच्छा सोचते हैं, दूसरों का भला चाहते हैं।

03). बाजार की तली हुई चीजें और खुली मिठाईयाँ शरीर की नाड़ियों में जहर घोलती हैं, इनसे विशेष बचें। अगर आप खाना ही चाहते हैं तो इन चीजों को घर में बनाइए प्रभु की याद में (परमात्मा के गीत लगाकर)।

04). सबसे बड़ी बात...अपनी दृष्टि पर सबसे ज्यादा ध्यान दीजिए, हम किसी को भी गल्त निगाहों से ना देखें, हम दूसरों को इस भाव से देखें कि ये भी भगवान के बच्चे हैं...इनका भी भला हो।

परमात्मा से लिंक जोड़ने से आपको क्या-क्या फायदे होंगे:-

01). मन भटकेगा नहीं, शांत होता जाएगा।

02). आप हरेक काम बहुत अच्छे से कर सकेंगे और आपको थकावट भी नहीं होगी।

03). आप की अन्तर की शक्तियाँ जागृत होंगी, जिससे बड़ी बात भी आपके लिए छोटी हो जाएगी, आप गुस्से को पीना सीख जाँएगे।

04). आप घर, व्यापार के सभी कार्य या फिर स्कूल, कालेज की पढ़ाई बड़ी सुंदरता से कर सकेंगे।

05). सबसे बड़ी बात आपमें खुशी आएगी, जिससे आप जिन्दगी को पहले की तुलना में बहुत अच्छे से जी सकेंगे।

06). उससे भी बड़ी बात आपको घर बैठे खुद भगवान मिल जाँएगे। 07). आप हर समस्या को बड़ी आसानी से हल कर पाँएगे।

08). यदि आप पूरी लग्न से परमात्मा से लिंक जोड़ेंगे, तो 100% आपकी लाइफ में चेंज आएगा।

आइए, अब जानते हैं एक ऐसे सवाल का जबाव, जो आमतौर पर हरेक मानव के मन में उठ जाता है कि भगवान ने ये संसार बनाया ही क्यूं...?

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देखिए अब, जिस तरह टी.वी. पर चलने वाली पिक्चर 3-4 घण्टे की होती है, ठीक उसी तरह संसार की पिक्चर पूरे 5000 वर्ष की है।इस पिक्चर में 4 बड़े युग होते हैं-सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग। इन सबकी आयु 1250 वर्ष होती है।

इन चारों युगों के अलावा एक छोटा-सा लीप युग होता है, जिसे संगमयुग कहते हैं। ये 100 वर्ष का होता है। सबसे पहले-पहले इस संसार में आदि सनातन देवी-देवता धर्म की आत्माँए, रोल प्ले करने आई, सतयुग, त्रेतायुग में। इसके बाद फिर द्वापर, कलियुग में मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख धर्म की आत्माँओ के साथ-साथ अन्य छोटे-छोटे धर्मों की आत्माँए रोल प्ले करने आई। हम सभी भी इन चारों धर्मों में से किसी एक धर्म में आए थे, रोल प्ले करने ओर जब आए थे इस धरती पर पहले-पहले, तब हम बहुत ही सुखी, शान्त व शक्तिशाली थे। हमनें धरती पर रहकर अनेक शरीर बदले(क्योंकि आत्मा एक शरीर बदल दूसरा धारण करती है)। धरती पर रोल खेलते-खेलते एक समय ऐसा आया कि हम सभी में बुराईयाँ(काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, नफरत, डर, आलस) राज करने लगी। फिर हम इन बुराईयों के शिकंजे में फँसते गए ओर बुराईयों के वश होकर हम कुकर्म करने लगे, इसी कारण ही आज हम इतने कमजोर पड़ गए, बुरे कर्म करते-करते कि भगवान को दोष देने लगे कि तूने यह दुनिया बनाई ही क्यूँ।

लेकिन भगवान ने तो ऐसी दुनिया बनाई थी, जिसमें एक भी दुखी नहीं था, सब बड़ी खुशी और प्रेम से रहते थे। लेकिन समय बीतते-बीतते हम बुराईयों के जाल में फँस गए ओर बुरे कर्म करते-करते कमजोर पड़ गए।

एक छोटा सा युग है, (संगमयुग) इस पिक्चर में, (यह युग कलियुग के अंत और सतयुग के बीच आता है)।इसमें खुद भगवान(शिव) इस धरती पर आते हैं, ब्रह्मा के साधारण बूढ़े तन में, 1937 में। खुद भगवान ही आकर इस सारी पिक्चर का राज समझाते हैं कि तुम वास्तव में हो कौन, संसार में कब आए, परेशान क्यूँ हुए। उन्होंने ही आकर इंसान को खुद की और खुदा की असली पहचान दी। और बताया कि बच्चे, यह संसार रूपी पिक्चर अब पूरी होने जा रही है, अब सभी को वहीं लौटना है, जहाँ से हम आए थे, उस लाल प्रकाश के घर से।

अब इस पुरानी दुनिया का विनाश होंगा-एटामिक बाम्बस से, प्राकृतिक आपदाओ से, ग्रह युद्धों से।

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क्योंकि संसार की 5000 वर्ष की पिक्चर अब पूरी होने जा रही है।

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सभी लौटेंगे, अब वहाँ, जहाँ खुद भगवान रहते हैं।

इस पुराने संसार के विनाश के बाद नई दुनिया स्वर्ग आएगी, जिसमें सभी फिर से सुखी जाँएगे ओर केवल एक ही धर्म होंगा-आदि सनातन देवी-देवता धर्म...इसके बाद फिर अन्य धर्मों की आत्माँए अपने-अपने समयानुसार इस संसार में फिर से आंएगी। इस प्रकार यह संसार की पिक्चर हर 5000 वर्ष बाद बिल्कुल पहले की तरह ही रिपीट होती है। अब सबको अपने असली घर परमधाम(शान्ति-धाम) लौटना है।

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(नई दुनिया)

परमधाम(शान्तिधाम)

इसलिए भगवान कहते हैं-मेरे बच्चे, मेरे से लिंक(सम्बन्ध) जोड़ो। अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो, मुझे याद करने से तुम्हारे सिर पर जो पापों का बोझा है, वह उतर जाएगा। और फिर तुम सम्पूर्ण हल्के हो जाओगे।

अगर हम भगवान को याद नहीं करते, फिर हमें ऊपर जाकर धर्मराज की सज़ाँए खानी पड़ेंगी। क्योंकि असली घर जाने से पहले हमारी आत्मा का शुद्ध(पवित्र) होना बहुत जरूरी है, इसलिए पापों का बोझ उतारना बहुत जरूरी है। मर्जी हमारी है-ये हम उतारें...या तो भगवान की याद से या फिर सजाओ से। तो ये है पूरा सच, संसार की कहानी का। आप इसको सच मानें या झूठ, मर्जी आपकी है। हम अगर भगवान को याद करेंगे, तो वो हमको मुक्ति का वरदान दे देंगे।

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Day 3

अब देखिए, आज मानव चाँद, मंगल तक पहुँच गया लेकिन वो यह नहीं जान पाया कि वो वास्तव में है कौन, मतलब इंसान के मरने के बाद ऐसी कौन सी चीज है जो उसमें से निकल जाती है?

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वास्तव में इस बात का जबाव किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। इसका जबाव वही दे सकता है, जो इस संसार को रचने वाला है, मतलब रचयिता। ओर इस संसार का रचयिता है-खुद भगवान।

1936-37 में खुद भगवान (निराकार) इस धरती पर साधारण बूढ़े तन में आया और उन्होने इस साधारण बूढ़े तन वाले इंसान को नाम दिया-ब्रह्मा।

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भगवान ने इनके तन में अवतरित होकर बताया कि मेरे बच्चे, वास्तव में तुम ये शरीर नहीं हो, जो हर रोज तुम शीशे में देखते हो।

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जिस तरह ड्राइवर के बिना गाड़ी चल नहीं सकती, ठीक उसी तरह आत्मा(सितारे) के बिना शरीर भी चल नहीं सकता।

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तो इन दो बातों के बारे में(खुद के बारे और खुदा के बारे) हमनें अच्छे से जाना, इनका ज्ञान लिया, अब हम भगवान से सम्बन्ध(लिंक) बहुत ही आसानी से जोड़ पाँएगे।

जैसे-जैसे हम भगवान से सम्बन्ध जोड़ते जाँएगे, उनको याद करते जाँएगे, वैसे-वैसे हमारे अन्दर शक्तियाँ जागने लगेंगी। ओर शक्तियाँ जागने से हमारा Silence level बढ़ जाएगा, जिससे हमारी Controlling और Decision-making Power बढ़ जाएगी।फिर हमें किसी भी बात में परेशानी नहीं होगी, ओर हम जिन्दगी को पहले की तुलना में बहुत अच्छे तरीक्के से जी पाँएगे।

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Day 1

आज हम अपनी जिन्दगी में छोटी-छोटी बातों पर ही परेशान हो जाते हैं मतलब हमें बहुत जल्दी हर बात पर चिड़चिड़ापन या गुस्सा आ जाता है और आजकल हमें नेगिटिव(नकारात्मक) बातें बहुत परेशान करने लगी हैं।

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क्या आप जानतें हैं इसका कारण कि हमारे साथ ऐसा क्यूं हो रहा है...

अगर नहीं, तो आइए जानतें हैं।

इसका सबसे बड़ा कारण है कि आज हम चारों तरफ से नेगिटिव(नकारात्मक) वातावरण में जी रहे हैं...जिसके कारण हमारे अन्दर की शक्तियाँ खत्म हो चुकी हैं, शक्तियाँ खत्म होने के कारण ही हम छोटी सी कोई बात को भी सहन नहीं कर पाते और अपना साईलेन्स(शान्त) लेवल खो बैठते हैं, जिससे हमारे में चिड़चिड़ापन या गुस्सा पैदा होता है दिन में कई बार।

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नेगिटिव वातावरण के कारण ही अनेक प्रकार के ऐसे विचार हैं, जिनमें से कुछ हमारे दिमाग में बार-बार चलते हैं और हमें दिन-प्रतिदिन अन्दर से खोखला(खाली) किए जा रहे हैं। आइए जानते हैं, वो कैसे-कैसे विचार हमारे अन्दर बार-बार चलते हैं:-

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1). कहीं भी सफलता नहीं मिल रही।

2). बनती-बनती बात बिगड़ गई।

3). काम का दबाव(Pressure) बहुत है।

4). खर्चे ही पूरे नहीं होते।

5). फँस गए इस काम में तो।

6). मेरे पल्ले तो कुछ भी नहीं।

7). लोग मेरे से ज्यादा चालाक हैं।

08). ओरों के पास तो इतना-इतना पैसा है, जमींनें हैं...ओर मेरे पास.....

9). मेरे पास वो चीज नहीं है।

10). ठीक चलते-चलते अचानक पता नहीं क्या हो गया।

11). उसने मुझे धोखा दे दिया।

12). गल्त घर में मेरी शादी करवा दी।

13). Adjustment ही नहीं करते वो हमारे साथ।

14). प्रापर्टी(सम्पति) में से मेरा हिस्सा मुझे दिया जाए, मैं किसी भी हद तक जाउंगा...अपना हिस्सा लेने के लिए।

15). वो खुद की गल्ती स्वीकार ही नहीं करता(जबकि ताली दोनों हाथों से बजती है)।

16). कारोबार ही थप हो गया।

17). लोग बहुत पापी बन चुके हैं।

18). मेरे पर किसी ने कुछ(जादू-टोना बगैरा) करवा दिया, दिमाग चलना ही बन्द हो गया।

19). मेरा क्या होगा, मेरे बच्चों का क्या होगा।

20). डर लगता है कि कहीं कुछ ऐसा-वैसा ना हो जाए।

21). कोई रिश्तेदार हाल पूछने ही नहीं आता।

22). मेरे बच्चे मेरी सुनते ही नहीं।

23). कई बार बीती हुई बातें या भविष्य की चिंता की बातें बार-बार घूमने लगती हैं दिमाग में।

24). धक्के खा रहे हैं जिन्दगी के।

25). मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया उसने।

26). उसने मुझे बहुत दुखी किया है...जी करता है....उसे मार डालूं।

27). वो मुझे छोड़कर चला गया (या चली गई)।

28). कई बार अकेलापन फील होता है।

29). कोई मेरा अपना नहीं है।

30). दिन में सिर कई बार भारी-भारी सा लगता है जबकि बुखार भी नहीं हुआ होता।

31). कोई खुशी नहीं है।

32). कहीं भी मन नहीं लगता।

33). जी करता है....कहीं भाग जाउं...इस नरक को छोड़कर।

34). जी करता है...मर जाउं।

35). यह जिन्दगी बोरिंग है।

36). मेरी कोई ईज्जत ही नहीं।

37). टाइम ही नहीं पास हो रहा।

38). मेरी ये बीमारी ठीक ही नहीं हो रही, पता नहीं...कौन-से पाप किए हैं।

39). मेरा शरीर अब चलने लायक नहीं रहा।

40). बहुत दूँढा भगवान को, पर नहीं मिला।

41). मेरे तो कर्म ही बेकार(खोट्टे) हैं।

42). अब तो भगवान मुझे उठा ले...तो अच्छा है।

43). भगवान ने ये दुनिया बनाई ही क्यूँ।

44). मैं उसके बिना नहीं जी सकता(या नहीं जी सकती)।

45). मैं कोई कम हूँ क्या उससे, उसकी अक्ल तो मैं ठिकाने लगाकर ही छोड़ूंगा।

46). उसकी जमीन मेरे नाम हो जाए ना...तो मजा आ जाए।

47). वो है ही क्या चीज मेरे सामने।

48). खायो, पियो, मौज करो...किसने देखा है परमात्मा।

49). कमाल है यार...अगर तूने दारू, अण्डा, माँस ही नहीं खाया कभी, फिर तेरी क्या जिन्दगी है...उपर जाकर धर्मराज को क्या जबाव देगा।

50). मेरी बिल्ली मुझे म्याँउं।

51). इनका तो घर ही उजड़ जाए।

52). ये कभी नहीं सुधर सकते।

53). उसने मेरी बेइज्जती की...जब तक बदला नहीं ले लेता...तब तक मेरी आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी।

54). बस पूछो मत...हमें पता है बस...कि कैसे दिन काट रहे हैं...जिन्दगी के।

ये थे ऐसे विचार, जिनमें से 5-7 तो आजकल हरेक मानव के अन्दर चल रहे हैं हर रोज।

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इन विचारों से या तो हम अपने लिए गल्त सोचते हैं या फिर दूसरों के लिए। गल्त विचार बार-बार दिमाग में आने से दिमाग की सही सोचने की तथा सही फैसला करने की शक्ति खत्म हो रही है दिन-प्रतिदिन। ओर जब इंसान की सही सोचने की शक्ति समाप्त होने लगती है तो वो चाहता है कि वही हो जो वो चाहता है ओर जब वैसा नहीं होता, तब पैदा होता है गुस्सा।

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गुस्से के पैदा होने से शरीर में चलने वाला खून जहरीला बनता है, जिससे हमारे अन्दर की शक्तियाँ धीरे-धीरे खत्म होती जाती हैं। शक्तियों के खत्म होने के बाद हमारा स्वभाव चिड़चिड़ा बनता जाता है धीरे-धीरे। ओर जब स्वभाव चिड़चिड़ा बन जाता है, फिर चाहे हमें सब कुछ...घर-बार, बाल-बच्चे, गाड़ियाँ, पैसा आदि मिल जाए, लेकिन हमें ऐसा लगता है कि कुछ तो है-जिस चीज की हमें अभी भी कमी है ओर वो कमी होती है-जिन्दगी में सच्ची खुशी की, सच्चे सुकून की। चाहे हम इस कमी के बारे में किसी को बताते नहीं लेकिन अन्दर-ही-अन्दर फील करते हैं इस कमी को। इस सच्ची खुशी को पाने के लिए पता नहीं हम क्या-क्या तरीक्के अपनाते हैं जिन्दगी भर लेकिन सब कुछ करने के बाद भी यही फील होता है कि दिल खुश नहीं है।मतलब उदासी फिर भी कभी-ना-कभी फील जरूर होती है।

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Thursday, November 5, 2015

Day 1

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सात दिनों का कोर्स -एक परिचय

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laxmi narayan

मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलियाँ हल करता रहता है।और उसके फलस्वरूप इनाम पाता है | परन्तु इस छोटी-सी पहेली का हल कोई नहीं जानता कि – “मैं कौन हूँ?”

'यों तो हर-एक मनुष्य सारा दिन “मैं...मैं ...” कहता ही रहता है, परन्तु यदि उससे पूछा जाय कि “मैं” कहने वाला कौन है? तो वह कहेगा कि--- “मैं कृष्णचन्द हूँ... या ‘मैं श्रीचन्द हूँ” | परन्तु सोचा जाय तो वास्तव में यह तो शरीर का नाम है, शरीर तो ‘मेरा’ है, ‘मैं’ तो शरीर से अलग हूँ | बस, इस छोटी-सी पहेली का प्रेक्टिकल हल न जानने के कारण, अर्थात स्वयं को न जानने के कारण, आज सभी मनुष्य देह-अभिमानी है और सभी काम, क्रोधादि विकारों के वश है तथा दुखी है |

अब परमपिता परमात्मा कहते है कि—“आज मनुष्य में घमण्ड तो इतना है कि वह समझता है कि—“मैं सेठ हूँ , स्वामी हूँ, अफसर हूँ....,” परन्तु उस में अज्ञान इतना है कि वह स्वयं को भी नहीं जानता | “मैं कौन हूँ, यह सृष्टि रूपी खेल आदि से अन्त तक कैसे बना हुआ है, मैं इस में कहाँ से आया, कब आया, कैसे आया, कैसे सुख- शान्ति का राज्य गंवाया तथा परमप्रिय परमपिता परमात्मा (इस सृष्टि के रचयिता) कौन है?” इन रहस्यों को कोई भी नहीं जानता | अब जीवन कि इस पहेली (Puzzle of Life) को फिर से जानकर मनुष्य देही (आत्मा)-अभिमानी बन सकता है और फिर उसके फलस्वरूप नर को श्री नारायण और नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति होती है और मनुष्य को मुक्ति तथा जीवनमुक्ति मिल जाती है | वह सम्पूर्ण पवित्रता, सुख एवं शान्ति को पा लेता है |

जब कोई मनुष्य दुखी और अशान्त होता है तो वह प्रभु ही से पुकार कर सकता है- “हे दुःख हर्ता, सुख-कर्ता, शान्ति-दाता प्रभु, मुझे शान्ति दो | ” विकारों के वशीभूत हुआ मनुष्य पवित्रता के लिए भी परमात्मा की ही आरती करते हुए कहता है- “विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा !” अथवा “हे प्रभु जी, हम सब को शुद्धताई दीजिए, दूर करके हर बुराई को भलाई दीजिए |”

परन्तु परमपिता परमात्मा विकारों तथा बुराइयों को दूर करने के लिए जो ईश्वरीय ज्ञान देते है तथा जो सहज राजयोग सिखाते है, प्राय: मनुष्य उससे अपरिचित है और वे इनको व्यवहारिक रूप में धारण भी नहीं करते | परमपिता परमात्मा तो हमारा पथ-प्रदर्शन करते है और हमे सहायता भी देते है परन्तु पुरुषार्थ तो हमे स्वत: ही करना होगा, तभी तो हम जीवन में सच्चा सुख तथा सच्ची शान्ति प्राप्त करेंगे और श्रेष्ठाचारी बनेगे |

आगे इस सात दिनों के कोर्स में परमपिता परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान एवं सहज राजयोग के बारे में विस्तार से बताया जायेगा।जिसे चित्र में भी अंकित किया गया है तथा साथ-साथ हर चित्र की लिखित व्याख्या भी दी गयी है ताकि ये रहस्य बुद्धिमय हो जायें | इन्हें पढ़ने से आपको बहुत-से नये ज्ञान-रत्न मिलेंगे | अब प्रैक्टिकल रीति से राजयोग का अभ्यास सीखने तथा जीवन दिव्य बनाने के लिए आप आनलाइन कोर्स के अलावा प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विधालय के किसी भी सेवा-केन्द्र पर पधार कर नि:शुल्क ही लाभ उठावें |

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Introduction Day 1 Day 2 Day 3 Day 4 Day 5 Day 6 Day 7 Spiritual Journey

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